शिकायत बोल

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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

अश्लीलता

Impose Ban on Dirty Websites in India  
भारत के लिए भस्मासुर हैं अश्लील वेबसाइटें
क्या कभी आपने सोचा है कि हमारी अपनी संस्कृति पर अधिकार जताने के लिए हम क्यों विवश हैं? क्यों ग्लोबलाइजेशन व उदारवादी विश्व अर्थव्यवस्था के नाम पर अनाचार, अश्लील, अनैतिक व अवैध कार्यों को वैध बनाने की कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की साजिश में हमें भागीदार बनाया जा रहा है?
जी हाँ, भारत में इंटरनेट क्रांति आने के 10-12 सालों के बाद आखिरकार पोर्न साईटों और समाज व देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले इसके दुष्प्रभावों पर एक खुली बहस छिड़ ही गई है। चुपके-चुपके एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत भारत के कानूनों के अनुसार अवैध इन बेवसाइटों को विदेशी सर्वरों के माध्यम से हर घर व आफिस में संवेदनहीन अन्तरराष्ट्रीय बाजारू ताकतों व उनके भारतीय एजेंटों द्वारा घुसा दिया गया। बिना इस बात का अध्ययन, विश्लेषण, बहस व रक्षात्मक उपाय किये बगैर, कि इस वैचारिक अतिक्रमण व सांस्कृतिक प्रदुषण से आम भारतीय विशेषकर बच्चे, किशोर व औसत बुद्धि के वयस्कों पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेंगे? कैसे समाज का पारिवारिक ढांचा टूटने लगेगा और समाज यौन पिपासु हो आत्मघाती होता जाएगा? हमें इस षडयंत्र के भारतीय गुनहगारों को खोजकर सजा दिलानी होगी. किन्तु इसकी आवाज उठाने से पूर्व हम अपनी माँग कि अश्लील पोर्न साईटों पर पूर्णतः प्रतिबंध लगना चाहिए के पक्ष में कुछ तर्क रखना चाहते हैं-
• उच्चतम न्यायालय ने पोर्न साईटों से संबंधित याचिका की सुनवाई के समय माना कि ‘चाइल्ड पोनोग्राफी’ गलत है और इससे संबंधित सामग्री को इंटरनेट पर प्रतिबंधित करने के सरकार को आदेश दिए। हमारा उच्चतम न्यायालय से आग्रह है कि जितने संवेदनशील आप उन विदेशी बच्चों के प्रति है जिनका शोषण कर ऐसी पोर्न फिल्मों का निर्माण किया जाता है उतना ही संवेदनशील अपने देश के के बच्चों, किशोरों व औसत बुद्धि के व्यस्कों के प्रति भी हो और उन पर इन साईटों के देखने से पड़ने वाले दुष्प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन करा लेने के बाद ही कोई निर्णय लें।
• कुछ लोग पोर्न को सही मानते हैं और इसे व्यक्ति की नैसर्गिक जरूरत तक के रूप में परिभाषित करते हैं। उनके अपने तर्क हो सकते हैं, किन्तु हमारे अनुसार किसी भी देश व समाज की अपनी-अपनी संस्कृति, सामाजिक सोच व बौद्धिक विकास की प्रक्रिया व दुनिया को देखने व जीने के तरीका होता है यह सबके लिये एक जैसा हो ही नहीं सकता।
• मौलिक भारत नामक संस्था ने सैकड़ों सामाजिक व धार्मिक संगठनों के साथ मिलकर पिछले एक वर्ष से अश्लीलता, नशाखोरी व इनके कारण नारी पर हाने वाले अत्याचारों के विरुद्ध एक अभियान चलाया हुआ है। हमें अभी तक 100 प्रतिशत लोगों ने समर्थन दिया है, हमारी खुली चुनौती है कि सरकार इस मुद्दे पर सभी तथ्यों को निष्पक्ष रूप से जनता के सामने रखकर जनमत संग्रह करा लें। हमारा पूरा विश्वास है कि 99 प्रतिशत भारतीय इस प्रकार की अश्लील बेवसाईटों के विरोध में मत देंगे। जनता से प्राप्त सुझावों व उनपर चिंतन-मंथन, विश्लेषण और शोध के उपरान्त हमारे कुछ स्पष्ट मत व तर्क हैं। हमारा उच्चतम न्यायाल व भारत सरकार से अग्रह है कि वे अदालती सुनवाई के समय इन तर्को व प्रश्नों का सारगर्भित जवाब देश की जनता को दे अन्यथा तुरन्त प्रभाव से पोर्न साइटों पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया शुरु करें।
• क्या पश्चिमी देशों में पोर्न साइटों व इनसे संबंधित व्यापारिक गतिविधियों को 5-7 वर्षों के अंदर समाज पर थोप दिया गया था?
• क्या जिन देशों में पोर्न देखना वैध है उन्होंने पहले किसी अन्य देश की ऐसी फिल्में देखी और फिर अपने देश में ऐसे व्यापार को प्रारंम्भ किया जो हम पर विदेशी पोर्न साइटों को हमसे पूछे बिना व बिना बहस के ही थोप दिया गया।
• क्या ऐसा कोई विश्वसनीय सर्वेक्षण है जो यह बताता हो कि पोर्न के व्यापार में लगे लोग अपने कार्यों से खुश हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उनके कार्यों को सुरक्षित व्यापार की श्रेणी में मान्यता दी हो?
• पोर्न साइटों की वकालत करने वाले मीडिया समूह इनका विरोध करने वालों को अपनी कवरेज में जगह क्यों नहीं देते?
• ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान हमारे पास उपलब्ध हैं जो प्रमाणित करते हैं कि पोर्न-देखने के बाद मानव में पशुता का भाव आ जाता है और उसके मन में रिश्तों की दीवार समाप्त हो जाती है व वह सामने वाले पुरुष या स्त्री को वस्तु की तरह देखने लगता है। विशेषकर स्त्रियों के प्रति आपराधिक होता जाता है।
• अगर पोर्न देखना, बनाना और दिखाना सही है तो इसे भारत में कानूनी मान्यता क्यों नहीं दी जा रही है?
• अगर पोर्न जो दिखा रही है वह सही हैं तो फिर विवाह, परिवार व समाज की अन्य संस्थाओं की मान्यता समाप्त की जानी चाहिए। सेंसर बोर्ड व अन्य सभी संबंधित कानूनों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।
• जो भारतीय पोर्न देखने के समर्थक हैं वे अपनी पोर्न बनाकर अश्लील साइटों पर क्यों नहीं क्यों नहीं डालते हैं?

• पोर्न के व्यापार में लगी हुई साइटों से भारत सरकार टैक्स क्यों नहीं वसूलती? निश्चित रूप से इस कर चोरी की आड़ में अरबों रुपयों का अवैध लेन देने होता होगा।
• क्यों सरकार ने इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों को ऐसी अवैध साइटों को नहीं दिखाने की स्पष्ट कार्यनीति व जरूरी संसाधन उपलब्ध नहीं कराये? हमारे खाली पड़े लाखों आई टी इंजीनियर इस दिशा में मददगार सिद्ध होंगे।
• इन बैवसाइटों पर जाने के लिए कोई पंजीकरण व शुल्क देकर ही प्रवेश करने की प्रक्रिया क्यों नहीं है?
• भारत सरकार विदेशी सर्वरों पर ही क्यों निर्भर है वह चीन की तरह अपने सर्वर क्यों नहीं विकसित कर रही है? ऐसे में अवैध अश्लील सामाग्री स्वयं ही छंटती जायेगी।
• क्या भारत जैसा एक विकासशील देश जिसका विश्व अर्थव्यवस्था में मात्रा 2 प्रतिशत व बौद्धिक संपदा में 0.01 प्रतिशत हिस्सा हो, वह अपनी नयी पीढ़ी को पोर्न, नशाखेरी, सट्टे व, उपभोक्तावाद व पश्चिमी अपसंस्कृति को शिकार बना तबाह करने की विदेशी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद फैलाने के षडयंत्र का मोहरा बनता जा रहा है? 90 करोड़ गरीबो के देश में पहले सबका विकास हमारी प्राथमिकता है या पोर्न उन्माद?
• क्या कहीं ऐसा तो नहीं है कि चूंकि पश्चिमी देशों में भयंकर मंदी व बेरोजगारी है और बाजार अर्थव्यवस्था में नये रोजगार पैदा नहीं हो रहे ऐसे में वे अपनी ही आबादी की ऐसे अधकचरे रोजगारों में धकेल रहे हों और भारत जैसे देश को भी अपन बाजार बना रहे हैं?
• देश में पोर्न समर्थक मीडिया व बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग कहीं इन बाजारु शक्तियों के ‘लाॅबिंग एजेन्ट तो नहीं हैं, जो भ्रम फैलकार अपनी फंडिंग एजेंसियों के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं?
• क्यों पिछले 20-25 वर्षो में बाजारवाद व खुली अर्थव्यवस्था आने के बाद ही अश्लील बेवसाइटों, ड्रग्स व सट्टे का अवैध कारोबार से धन की निकासी भारत में बढ़कर 15 से 20 लाख करोड़ तक हो गयी और इनके नियमन के लिए कोई कानून नहीं बनाये गये।
• क्या पोर्न समर्थकों ने इन फिल्मों में निर्माण में धकेले गये लोगों के उत्पीड़न व इन पोर्न को देखकर उत्पीड़न का शिकार हुए लोगों की स्थिति जानने की कोशिश की हैं? क्या इनमें मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाई है?
देशवासियों, क्षणिक भावनाओं में आकर अगर आप अपनी नयी पीढी व देश के भविष्य को गर्त में ढकेलना चाहते हैं तो आपकी मर्जी मगर हम यह कानते हैं कि हर देश की अपनी संस्कृति व विकास चक्र होता है, ग्लोवलाइजेशन’ को अबाध रूप से थोप देने से जो संवेदनहीन व पशुवत समाज हम बनाते जा रहे हैं वह हमें भस्मासुर’ ही बना रहा है अर्थात हम स्वयं ही स्वयं का सर्वनाश करने का प्रबंध कर रहें हैं।
मौलिक भारत ट्रस्ट का आहवान है कि हम अपनी सोच, संस्कृति, मौलिकता, क्रमिक बौद्धिक विकास व चिंतन मंथन से निकली हुई जीवन शैली को ही स्वीकार करें, ग्लोवलाइजेशन के नाम पर हावी बाजारु ताकतों के जीवन दर्शन को कदापि नहीं। अगर सरकार व न्यायालय इस प्रकार के संविधन कानून मानवता, नैतिकता व जनविरोधी कार्यो को रोक पानें में असमर्थ हैं व इनके परिचालन पर नियंत्रण नहीं कर सकती तो उनका अस्तित्व ही निरर्थक है (चीन ने सफलतापूर्वक यह कर दिखाया है।)  नेताओं को इस लोकतांत्रिक देश की जनता ने अपने-अपने पदों पर इसीलिये बैठाया है कि वे देश में यथासंभव कानून का राज्य स्थापित करें न कि अवैध व गैर कानूनी गतिविधियों को संरक्षण दें या उनके आगे आत्मसमर्पण कर दें।
साभार (लिन्क): सुरेश चिपलूणकर 
 

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