शिकायत बोल

शिकायत बोल
ऐसा कौन होगा जिसे किसी से कभी कोई शिकायत न हो। शिकायत या शिकायतें होना सामान्य और स्वाभाविक बात है जो हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। हम कहीं जाएं या कोई काम करें अपनों से या गैरों से कोई न कोई शिकायत हो ही जाती है-छोटी या बड़ी, सहनीय या असहनीय। अपनों से, गैरों से या फ़िर खरीदे गये उत्पादों, कम्पनियों, विभिन्न सार्वजनिक या निजी क्षेत्र की सेवाओं, लोगों के व्यवहार-आदतों, सरकार-प्रशासन से कोई शिकायत हो तो उसे/उन्हें इस मंच शिकायत बोल पर रखिए। शिकायत अवश्य कीजिए, चुप मत बैठिए। आपको किसी भी प्रकार की किसी से कोई शिकायत हो तोर उसे आप औरों के सामने शिकायत बोल में रखिए। इसका कम या अधिक, असर अवश्य पड़ता है। लोगों को जागरूक और सावधान होने में सहायता मिलती है। विभिन्न मामलों में सुधार की आशा भी रहती है। अपनी बात संक्षेप में संयत और सरल बोलचाल की भाषा में हिन्दी यूनीकोड, हिन्दी (कृतिदेव फ़ोन्ट) या रोमन में लिखकर भेजिए। आवश्यक हो तो सम्बधित फ़ोटो, चित्र या दस्तावेज जेपीजी फ़ार्मेट में साथ ही भेजिए।
इस शिकायत बोल मंच के बारे में अपने इष्ट-मित्रों को भी बताएं।
ई-मेल: शिकायत बोल
shikayatbol@gmail.com
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शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

पैकिंग

माल से बड़ा लिफ़ाफ़ा
बाज़ार में मिलने वाली अनगिनत वस्तुएं ऐसी हैं जो तरह-तरह की पैकिंग में मिलती हैं। ज्यादातर मामलों में यही देखा गया है कि पैकिंग बहुत बड़ी होती है और उसमें रखा गया सामान बहुत कम होता है जो उससे आधे आकार की पैकिंग में भी आसानी से आ जाता। इस तरह यह काम संसाधनों के दुरुपयोग की श्रेणी में ही आता है। उत्पादक अतिरिक्त व्यय को अन्तत: ग्राहक से ही वसूलता है। 
पैकिंग उचित आकार की और पारदर्शी होनी चाहिए ताकि ग्राहक को दिखाई दे कि वह क्या और कितना सामान पैकिंग में लाया है। इसके अलावा अक्सर पैक्ड वस्तु का वजन भी बेतुका होता है- २३०, ८५, ३५ ८०, ४५०...ग्राम। 

बुधवार, 24 सितंबर 2014

सूरकुटी

‘सूरकुटी’ पहुंचने को खरीदना पड़ता है 

ताजमहल से भी महंंगा टि‍कट

ताजमहल से कही महंगा और झंझट भरा है सूरकुटी तक का आना जाना। इस स्‍थान तक पहुंचने को तीस रुपये का शुल्‍क टि‍कट के रूप में वन वि‍भाग वसूलता है।यही नहीं अगर वाहन का इस्‍तेमाल आने जाने में कि‍या जाता है तो उसका शुल्‍क अलग से चुक्‍ता करना होता है।
आगरा पर्यावरण और वन संरक्षण कानूनों की मनमानी व्‍याख्‍याओं और कागजी हुक्मो से आगरा के वि‍कास कार्यों को तो धक्‍का लगता ही रहा है, हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य प्रमुख स्‍थंभ महाकवि‍ सूरदास को तो आम जनता से एक दम दूर ही कर दि‍या गया है। 
सूरकुटी
सूरदास जी कर्मस्‍थली कीठम गांव में यमुना कि‍नारे पर  है।यहां पुराने मन्‍दि‍र और सूरकुटी स्‍थि‍त हैं। देश के पुराने आश्रम पद्यति‍ के दृष्टिहीन वि‍द्यालयों में से एक यहां अब भी संचालि‍त है। कि‍न्‍तु इस स्‍थान तक पहुंचने को तीस रुपये का शुल्‍क टि‍कट के रूप में वन वि‍भाग वसूलता है।यही नहीं अगर वाहन का इस्‍तेमाल आने जाने में कि‍या जाता है तो उसका शुल्‍क अलग से चुक्‍ता करना होता है।
गुपचुप तरीके से लगा डाला टि‍कट
जब भी बात हुई तब तब राष्‍ट्रीय चम्‍बल सेंचुरी प्रोजेक्‍ट के कार्य अधि‍कारि‍यों की ओर से यही कहा जाता रहा कि‍ सेचुरी क्षेत्र में होकर आने-जाने वाले मार्ग पर पडने से सूरकुटी जाने को भी टि‍कट खरीदना होगा। जब भी सूरकुटी के लि‍ये वैकल्‍पि‍क मार्ग दि‍ये जाने का मुद्दा सामने रखा गया उस पर भी सरकारी तंत्र की ओर से वि‍चार करने से हाथ खडे़ कर दि‍ये गये। सबसे दि‍लचस्‍प तथ्‍य यह है कि‍ जि‍स रास्‍ते पर बैरि‍यर लगाकर वन वि‍भाग वसूली करता है,मूल रूप से वह कुटी के लि‍ये ही जि‍ला पंचायत की ओर से बनाया गया था। यही नहीं, जि‍स गैस्‍ट हाऊस को वन वि‍भाग ने अपने प्रबंधन में ले रखा है, वह भी लोकनि‍र्माण वि‍भाग के द्वारा तत्‍कालीन लोक नि‍र्माण मंत्री स्‍व. जगन प्रसाद रावत ने अपने प्रयासों से बनवाया था जो कि‍ सूर स्‍मारक मंडल के भी पदाधि‍कारी रहे थे।
अप्रत्‍याशि‍त रूप से लगना शुरू हुए प्रति‍बंध
सबसे आश्‍चर्यजनक यह है कि‍ सूरकुटी का क्षेत्र कब बर्ड सेंचुरी क्षेत्र में आया और कब इसके लि‍ए जनुनवायी हुई यह भी कम से कम सूरस्‍मारक मंडल के पदाधि‍कारि‍यों ही नहीं आसपास के ग्रामीणों तक को तब मालूम हुआ जब एक-एक कर प्रति‍बंध लगाये जाने का क्रम शुरू हो गया। बाद में जब ईको सेंस्‍टि‍व जोन की बैठकें शुरू हुईं तो उनमें से कुछ में रस्‍मारक मंडल के प्रति‍नि‍धयों को बुलाया जरूर गया कि‍न्‍तु उनकी कोई बात नही सुनी गयी। अब तो पुनर्गठि‍त कमेटी में उन्हें बुलाया भी नहीं जाता है।
केन्‍द्र के रुख से राहत संभव
अब तक रहे केन्‍द्र सरकार के रवैय में आये बदलाव से सूरस्मारक मंडल को कुछ राहत मि‍ल पाने की उम्‍मीद है, बशर्ते अधि‍कारी भी इस बदला को महसूस करने की स्‍थि‍ति‍ में हों। इस बदलाव का संकेत केन्‍द्रीय जल साधननदी विकास व गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने उत्तराखंड में गोमुख से उत्तरकाशी (150 किमी.) तक घोषित ईको सेंसेटिव जोन पर फिर से विचार करने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही व्‍यापक परि‍प्रेक्ष्य में उन्होंने कहा कि ईको सेंसेटिव जोनों की गलत व्याख्या की गई है। प्रकृति‍ के संरक्षण के नाम पर कानूनों का मनमाने तरीके से इस्‍तेमाल कि‍या जाता रहा है। स्थानीय लोगों के हितों की अनदेखी हुई है। इसमें क्षेत्रीय जनसमुदाय के हितों को भी शामिल किया जाना चाहिए। मीडिया से बातचीत में मंत्री ने कहा कि जिस तरह ईको सेंसेटिव जोन क्षेत्र में तमाम गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशि‍शें की जाती हैउससे लगता है कि इसकी गलत व्याख्या की गयी। क्षेत्र के संसाधनों पर पहला हक स्थानीय लोगों का है। ईको सेंसेटिव जोन पर फिर से विचार किया जाए और स्थानीय लोगों के हक -हुकूक सुरक्षित किए जाएं। 
सरकार की नीति‍ के वि‍रूद्ध अपनाया जाता रहा है रवैयाा
सूरस्‍मारक मंडल के महामंत्री डॉ. गि‍रीश चन्‍द्र शर्मा और नि‍वर्तमान महामंत्री डॉ. वि‍जय लक्ष्‍मी शर्मा ने कहा है कि‍ इससे बडा दुर्भाग्‍य क्‍या होगा कि‍ भारत सरकार की सांस्‍कृति‍क और एति‍हासि‍क महत्‍व के स्‍थलों को संरक्षि‍त करने की नीति‍ है कि‍न्‍तु सूरकुटी के मामले मे सरकारी वि‍भाग ही असहयोग की नीति‍ अपनाने को आमादा हैं।
• राजीव सक्सेना
सौजन्य लिन्क: आगरा समाचार


शनिवार, 20 सितंबर 2014

टोल बोल

टोल टैक्स नाके यानी टॉर्चर नाके

• रघु ठाकुर

केन्द्रीय परिवहन मंत्री श्री नितिन गड़करी ने संसद में टोल टैक्स के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण घोषणायें की हैं:-
१. उन्होंने कहा कि निर्माण की लागत खर्च की पूर्ति होते ही टोल टैक्स वसूली बंद की जायेगी।
२. सरकार अग्रिम टोल टैक्स भुगतान की योजना के बारे में भी विचार कर रही है ताकि टोल टैक्स नाकों पर लंबी-लंबी लाईनें न लगें।
नि:सन्देह उनकी ये दोनों घोषणाएं पुरानी व्यवस्था से कुछ
आगे जाने वाली है और जनता के टोल टैक्स दर्द पर हल्की सी मरहम लगाने वाली हैं। परन्तु क्या यह वास्तव में यह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार के अनुकूल है? क्या ये घोषणायएं गॉंंव व शहर के बीच के विभेद को दूर करने वाली हैं? और क्या इनसे कोई बड़ा बदलाव हासिल हो सकेगा? इन दृष्टिकोणों से विचार करना होगा।
दरअसल टोल टैक्स नाकों का निर्माण और टोल टैक्स की कल्पना कहने को सरकार के पीपीपी मॉडल की संतान है जिसे सार्वजनिक व निजी भागीदारी की कल्पना कहा जाता है और इस योजना के नाम पर सरकारों ने सड़क निर्माण के काम को निजी हाथों में देने का षड़यंत्र रचा था। आजादी के बाद से यह आम धारणा रही है कि सस्ता यातायात उपलब्ध कराना, आम जनता को सड़क बनाकर देना आदि कार्य सरकार के दायित्व हैं परन्तु वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के दौर में सरकार ने बड़ी चतुराई के साथ मीठे शब्द जाल बांध कर सड़क निर्माण के काम को निजी क्षेत्र को सौंप दिया। अब सरकारें सड़क निर्माण के लिये टेण्डर मंगाती है जिन्हें बड़े-बड़े ठेकेदार भरते हैं, फिर सरकार परदर्शिता के साथ अपने सहयोगी या सहभागी ठेकेदारों को इस चतुराई व कौशल के साथ दिला देती है कि आरोप लगाना तो दूर उनकी मिलीभगत की भनक न लग पाये।
इस योजना के तहत सरकार ने यह तय किया है कि ७५-७५ किमी. से कम के खण्ड की सड़कें बनाने के टेण्डर निकाले जाएंगे और यह इसलिये होता है क्योंकि ठेकेदार ऐसा ही चाहते हैं। इसका दूरगामी असर यह होता है कि सड़क निर्माण के बाद जब संबंधित ठेकेदार टोल टैक्स के लिये नाके शुरू करता है तो एक ही सड़क पर कई टोल टैक्स के नाके लग जाते हैं। उदाहरण के लिये अगर भोपाल से इंदौर जाना हो तो फिलहाल ३ और कुछ समय बाद 4 टोल टैक्स के नाके लग जायेंगे। एक-एक कार या जीप गाड़ी वाले को एक तरफ़ से लगभग १५०-२०० रुपये टोल टैक्स में देना होता है। यानी लगभग १ रुपया प्रति कि.मी. की टोल टैक्स की दर हो जाती है। अगर रेल में यात्रा करना हो तो सामान्य श्रेणी मे ३०-४० पैसे प्रति किमी., स्लीपर क्लास में ७०-८० पैसे प्रति किमी. कुल किराया लगता है। जबकि टोल टैक्स १ रूपया प्रति किमी. के आसपास हो जाता है। बसों और ट्रकों को जो टोल टैक्स देना पड़ता है वह तो आने-जाने पर हजारोें रुपये हो जाता है और अंततः उसे आम आदमी को या तो यात्री बस किराये के रूप में या माल भाड़ा वृद्धि के रूप में देना पड़ता।
महानगरों में बड़े पैमाने पर सड़कें व फ्लाई ओवर बनाये जा रहे हैं जिन पर हजारों करोड़ रुपया खर्च हो रहा है परन्तु वहॉं कोई टोल टैक्स नही लगता। देश की राजधानी दिल्ली में पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में फ्लाई ओवर बने हैं परन्तु उनके लिये कोई टोल टैक्स नही हैं क्योंकि उन्हे सरकार ने जवाहर लाल नेहरू शहरी विकास मिशन के नाम पर बनाया है।
इसको तो जरूर सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने इस योजना का नाम जवाहर लाल जी के नाम से ठीक रखा है क्योंकि जवाहर लाल देश के विकास का मतलब महात्मा गॉंधी की राय के विपरीत शहरों का विकास मानते थे और यही कल्पना उनकी योजना में भी थी। हालांकि उन्होंने भी अपने कार्यकाल में गॉंवों को विकास की कसौटी भले ही न माना हो परन्तु इतनी तो कृपा की ही थी कि गॉंंव कस्बों की सड़कों का निर्माण सरकारी पैसों से होता था, पीपीपी से नही होता था। और सड़क के बदले में वसूली के लिये टोल टैक्स नाके नही थे। वैसे भी एक कल्याणकारी राज्य में सड़कों का निर्माण और रखरखाव सरकार का दायित्व होता है। आने-जाने के मामले में यह बुनियादी जरूरत है। सड़क कोई उद्योग नही है और इसलिए अच्छा होता कि श्री गड़करी जी नयी शुरूआत करते तथा सड़क निर्माण देशी विदेशी ठेकेदारों की पूंजी से कराकर जनता की जेब पर डाका डालने की इस दस्यु नीति को बदलकर कल्याणकारी नीति को लाते।
टोल टैक्स इसलिए भी गलत है कि यह वाहन मालिकों या जनता के ऊपर लगाया गया एक ही सुविधा का दूसरा टैक्स है। मोटर व्हीकल्स एक्ट के अनुसार हर वाहन क्रेता को रोड टैक्स देना होता है और अगर रोड ही नही है तो रोड टैक्स किस बात का? परन्तु सरकार अपने कानूनी डंडे का इस्तेमाल कर सड़क निर्माण के नाम पर पहले रोड टैक्स लेती है और फिर उसी सड़क के निर्माण के लिये निजी पूंजी लगाने वाले ठेकेदारों को बुलाकर उनकी पूंजी के बदले में मयब्याज और मुनाफा की वसूली टोल टैक्स से कराती है।
नैतिक आधार पर सरकार को जहॉं रोड टैक्स ले लिया गया है, वहॉं सड़कों का निर्माण स्वतः कराना चाहिए और अगर नयी सड़कों का निर्माण हो रहा है तो फिर रोड टैक्स के रूप में लिया गया पैसा वापिस करना चाहिए। परन्तु वैश्वीकरण के दौर में सरकारें स्वतः वैश्य बन गई हैं यानी व्यापार करने वाली बन गयी हैं और वे जनता के साथ व्यापार कर रही हैं। ठेकेदार या उद्योगपति वे धनपति होते हैं जो पूंजी के बदले में जनता से पैसा वसूलते हैं और सरकार ऐसी साहूकार बन गयी है जो निर्वाचन का लबादा ओढ़कर लोकतंत्र का दंड हाथ में लेकर कानून के कारतूस से जनता को लूटती है।
इन टोल टैक्स नाकों में वसूली के तरीके, गुंडई के तरीके बन गये हैं। ठेकेदारों ने आसपास के बाहुबलियों को थोड़े से पैसों के लिये अपना वसूली कर्मचारी बनाया है और वे वसूलीकर्ता समूहबद्ध होकर यात्री या वाहन चालकों की अकेलेपन की कमजोरी का फायदा उठाकर जितना मर्जी आये उतना टैक्स वसूलने हैं। गॉंंव के बेचारे किसान लोग जो दस-बीस लोग एकत्रित होकर, अपने एक-एक, दो-दो बोरी अनाज मंडी में बेचने को जाते हैं, वे रात में, ठंड, बरसात में, दिन में, तपती दोपहरी में घंटो गिड़गिड़ाते खड़े या पड़े रहते हैं।
सत्ताधीशों से मिलीभगत होने के कारण ठेकेदारों के इन बाहुबलियों का मनोबल इतना बढ़ चुका है कि अब उन्होंने आमजन से बढ़कर जपप्रतिनिधियों और यहॉं तक कि विधायकों तक को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है। हाल ही में म.प्र. के मुरैना के विधायक व पूर्वमंत्री और स्वतः पुलिस के आईजी रहे श्री रूस्तम सिंह को न केवल बाहुबलियों का शिकार होना पड़ा बल्कि उनकी रिर्पोट पर भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नही की। इसके पहले दो और विधायकों के साथ ऐसी घटनायें घट चुकी हैं, जहॉंं वे अपने परिवार के साथ टोल टैक्स नाके पर से गुजरते समय पिटाई और अपमान के शिकार हुए। म.प्र. की विधानसभा के सत्तापक्ष के एक विधायक को उनकी पत्नी व बच्चों के सामने टोल टैक्स के बाहुबलियों ने पीटा, उन्हें चोटें भी आई और यहॉं तक कि वे विधानसभा में आकर रोये परन्तु उनके ऑंंसू भी सरकार के मुखिया के मन को न छू सके। टोल टैक्स के ठेकेदारों और शासन के सत्ताधीशों के संबंध कितने गहरे हैं यह इस घटना से स्पष्ट हो जाता है।
इन टोल टैक्स नाकों पर गााड़ियों के रूकने से यात्रा का समय बढ़ जाता है और जो गाड़ी आसानी से 3 घंटे में भोपाल से इंदौर पहुंच सकती है, उसे औसतन 30-40 मिनिट का समय ज्यादा लगता है। इतना ही नही गाड़ियों का ईधन खर्च भी बढ़ जाता है। एक विशेषज्ञ ने मुझे बताया कि जितने पेटोल या डीजल के खर्च पर गाड़ी 400 कि.मी. जा सकती है, टोल टैक्स नाके और सड़कों की भीड़ की वजह से वह गाड़ी उतने ही ईधन में मुश्किल से 300 कि.मी. जाती है। यानी हर 300 कि.मी. की यात्रा में एक-एक गाड़ी का 100 कि.मी. की यात्रा के बराबर औसतन 5-6 लीटर पेट्रोल या डीजल ज्यादा खर्च होता है। और इसका राष्टीय अध्ययन किया जाए तो राष्ट्रीय स्तर पर शायद हजार भी नहीं लाख करोड़ रुपये का ईंधन जिसे हम विदेश से आयात करते है, इस प्रकार बरबाद हो जाता है।
विशेषज्ञ का यह भी कहना था कि बार-बार गाड़ी के बंद करने व शुरू करने से गाड़ी के इंजिन पर भी असर पड़ता है। पर इतना तो तय है कि टोल टैक्स पर खड़ी या जाम और भीड़ में फॅंसी गाड़ियॉं जब लगातार खड़े-खड़े धुंआ उगलती हैं तो लाखों लोग उस धुंए को पीने को लाचार होते हैं और अस्थमा जैंसी बीमारी को लाचार होते हैं. सड़कों के किनारे की फसल पर भी इसका प्रभाव पड़ता है. याने अगर टोल टैक्स और पी.पी.पी. का चलन समाप्त कर सरकारें संविधान के अनुकूल कार्य करें तथा टोल टैक्स हटा दें तो देश के आम आदमी के लाखों-करोड़ों रुपये बच सकता है. प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है। यात्रा की अवधि कम हो सकती है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जो गति बढ़ाना चाहते हैं, वह गति बढ़ सकती है तथा आमजन से लेकर विधायक तक जो टोल टैक्स नाकों (जो वस्तुतः टारचर टैक्स नाके बन गये हैं) में पिटाई व अपमान से बच सकते हैं।
साभार
लिन्क: रविवार.कॉम
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• ता.च. चन्दर
इसी प्रकार दिल्ली से आगरा का इकतरफ़ा केवल एक कार का टोल टैक्स लगभग ३०० रुपये है। वहीं (खतरनाक) यमुना एक्सप्रेस वे पर १६५ किमी. के लिए टोल टैक्स ३२० रुपये है। समय की बरबादी अलग- कभी कम और कभी ज्यादा। और मज़ाक देखिए, राजस्थान में दौसा की तरफ़ जाते हुए भीतरी रास्ते में एक १५-२० फ़ुट की गली नुमा सड़क पर इधर-उधर २ ड्रम रखकर बनाये गये ‘टोल’ पर बिना रसीद के १० रुपए देने पड़े। नाना प्रकार की पार्किंग  के नाम पर लिया जाने वाला शुल्क भी किसी लूट से कम नहीं है।
yamuna express way
 Exemption from payment of fee
No fee shall be levied and collected from a mechanical vehicle:
Transporting and accompanying:
The President of India;
The Vice – President of India;
The Prime Minister of India;
The Chief Justice of India;
The Governors;
The Lieutenant Governors;
The Chief Ministers;
The Presiding Officers of Central and State Legislatures having jurisdiction;
The Leader of Opposition in Lok Sabha, Rajya Sabha and the State Legislatures having jurisdiction;
The Judges of Supreme Court;
The Chairman of the Legislative Council of the State;
The Speaker of the Legislative Assembly of the State;
The Chief Justice of High Court;
The Judges of High Court;
The Ministers of Govt. of India;
Ministers of GoUP;
Secretaries and Commissioners of GoUP;
Foreign dignitaries on State visit;
Heads of Foreign Missions stationed in India using cars with CD symbol;
All Government vehicles;
Vehicles used for official purpose by:-
The Ministry of Defence including those which are eligible for exemption in accordance with the provisions of the Indian Toll (Army and Air Force) Act, 1901 and rules made there under, as extended to Navy also;
The Central and State armed forces in uniform including para military forces and police;
An executive Magistrate on duty;
The persons required to use the Expressway for discharging their statutory obligations in relation to the Site;
A fire fighting department or organization;
Officers of Concerned Expressway Authority; and
Vehicle used as ambulance
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Vehicle CategoryTill AligarhTill MathuraTill AgraFor Round Trip
Two wheeler50100150280
Car/Jeep/Van100220320510
LCV/Mini-Bus150350500800
Bus/Truck30070010501680
Multi-axle Vehicle350105016002560
7+ axle Vehicle60014002100
3360

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

लूट

अस्पतालों की लूट-पाट 
महंगा इलाज नहीं सीधीसीधी लूट                            • फ़ोटो: विशाल
भारत के अस्पताल और डाॅक्टर रोगियों को किस बुरी तरह लूटते हैं, इस बारे में कुछ तथ्य अभी सामने आये हैं। रोगियोंकी शल्य-चिकित्सा के समय जो भी उपकरण उनके शरीर में लगाये जाते हैं, उन्हें दुगुने-तिगुने दामों में बेचा जाता है। रोगी या उसके परिजन मजबूर होते हैं। वे क्या करें? अस्पताल या डाक्टर जो भी बिल बनाकर दे देता है, वह उन्हें भरना पड़ता है। अभी पता चला है कि हृद-रोग से पीड़ितों को जो ‘स्टेन्ट’ लगाया जाता है, उसपर अस्पताल ६० हजार रु. से १ लाख रु. तक मुनाफा कमाते हैं। वे रोगी से कहते हैं कि यह यंत्र तो हमने विदेश से मंगाया है। क्या करें, यह डाॅलर में खरीदना पड़ता है। आपको पता ही है कि डाॅलर तो रुपए की तुलना में लगभग ६० गुना भारी होता है। बेचारा रोगी यह कैसे पता करे कि अस्पताल ने वहउपकरण कौनसी कंपनी से मंगाया, कितने में मंगाया और कब मंगाया।
कई बार कई मियाद बाहर उपकरण भी रोगियों को चिपका दिए जाते हैं। रोगियों को यह भी बता दिया जाता है कि विदेशी उपकरण ही सर्वश्रेष्ठ हैं। भारत में बने उपकरण का कोई भरोसा नहीं। रोगी को अपना घर या जेवर या जमीन बेचना पड़े लेकिन वह अस्पताल की इस ठगी का शिकार हुए बिना नहीं रह पाता। जो लोग गरीब हैं (इनकी संख्या १०० करोड़ के आस-पास है), उनके पास बेचने केलिए कुछ नहीं होता है। उन्हें कर्ज भी कौन देगा? वे अपना इलाज़ कराने की बजाय अपना सिर मृत्यु की दहलीज़ पर टिका देते हैं। चिकित्सा-जैसे पवित्र-व्यवसाय को इतना अधःपतन हो रहा है और हमारी सरकार सोई हुई है। जैसे दवाइयों की कीमतों पर कुछ नियंत्रण लागू हुआ है, वैसे ही इन चिकित्सा-उपकरणों की कीमतों पर नियंत्रण की व्यवस्था तुरन्त क्यों नहीं करती? जरुरी यह है कि देश में चिकित्सा और शिक्षा सर्वसुलभ हो। इसके लिए या तो इन दोनों का पूर्ण सरकारीकरण हो या फिर स्कूल-कालेजों और अस्पतालों पर इतना कड़ा नियंत्रण हो कि वे किसी को ठग न सकें। आजकल पढ़ाई और दवाई, दोनों में नैतिकता शून्य होती जा रही है। वे सिर्फ पैसा कमाने का धंधा बन गए हैं। धंधों में फिर भी कुछ नैतिक नियमों का पालन होता है लेकिन पढ़ाई और दवाई के क्षेत्रों में जैसी लूटमार और ठगी का माहौल बन गया है, वह दुनिया के ‘सबसे पुराने धंधे’ को भी मात करता हुआ दिखाई पड़ रहा है।
• डॉ. वेद प्रताप वैदिक 
(साभार)

सोमवार, 15 सितंबर 2014

तेल

हिन्दी की हिन्दी में हिन्दी
देखिए, यह कैसी हिन्दी है एक सिर तेल बेचू कम्पनी की (सौजन्य- सम्बन्धित विज्ञापन एजेंसी और दैनिक हिन्दुस्तान, नयी दिल्ली)-

‘दुनिया की सब
महंगा तेल ने 
दिया धोका!
आखिर में सिर्फ़
अश्विनी ही बाल
गिरना रोका।’

परम्परा

पशु वध
मेनका जी या (मानेका) और इस सरकार को रोकता कौन है पशु वध पर रोक लगाने से। जंगल अब भी खूब कट रहे हैं- लक्ड़ी का फ़र्नीचर खूब बन-बिक रहा है। ट्रक भरभर कर लकड़ी आ रही है। पशु वध कड़ाई से रोको, जंगल बचाओ और लोगों को मांसाहार के नुकसान बताते हुए शाकाहारी बनने को प्रेरित करो। जब धूम्रपान-तम्बाकू-गुटखा के मामले में कड़े कदम उठा सकते हैं तो इस मामले में क्यों नहीं। गलत परम्पराएं बन्द भी की जा सकती हैं। ध्वनिविस्तारक (लाउडस्पीकर), रेडियो-टीवी-फ़िल्म, मोबाइल फ़ोन, कम्प्यूटर आदि तमाम चीजें किसी परम्परा का अंग नहीं हैं पर दशकों से उपयोग में लाई जा रही हैं। तो क्या कुर्बानी/बलि/ त्यौहार/आहार के लिए पशु वध/बलि की परम्परा को सख्ती से बन्द नहीं किया जा सकता। दरअसल एक ऐसा बड़ा वर्ग है जो पशु धन को नष्ट करके अपना धन्धा जमाए हुए है। मांस, चमड़े आदि की खपत-निर्यात से यह वर्ग भरपूर कमाई करता है।....कहने को बहु
त कुछ है पर किसे समझाएं, जिन्हें समझाना चाहते हैं वे सभी ‘छंटे’ हुए समझदार हैं।

• कार्टूनिस्ट चन्दर

बुधवार, 3 सितंबर 2014

रसोई गैस

ग्राहक बना बेचारा 
द्वापर युग के चक्रव्‍यूह से भी अधि‍क पेचीदगी वाला है कुकिंग गैस वि‍रतण तंत्र। आगरा में कुकि‍ग गैस वि‍तरण व्‍यवस्‍था अवि‍श्‍वसनीयता के दौर में पहुंच गयी है। एक ओर इस पर न तो भारत सरकार के कार्यदायी उपकृम ही नि‍गरानी करने की स्‍थि‍ति‍ में हैं और न ही दूसरी ओर समाजवादी सरकार के नागरि‍क अपूर्ति‍ व्‍यवस्‍था से जुडा तंत्र। बुकिंग के लि‍ए इस्‍तेमाल में आ रहा साफ्टवेयर टैम्‍परि‍ग का शि‍कार है। आप कई ट्रायल में अगर गैस का सि‍लेण्डर बुक करवाने में कामयाब भ्‍ाी हो गये तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि‍ आपके पास सि‍लेण्डर पहुंच ही जाए। यह बात अलग है कि‍ मोबाइल पर एसएमएस का आना जरूर बना रहेगा। 
जब डि‍लीवरी का मैसेज आये दो दि‍न बीत जायेंगे तब आप थो़ड़े परेशान होकर जब डीलर के पास पहुंचेंगे तो कम्‍प्‍यूटर के करसर को एक-दो बार क्‍लि‍क करके वह कहेगा कि‍ कल आपको आपका सि‍लेंडर मि‍ल जायेगा।   गैस कंपनि‍यां करवाये सर्वेक्षण आप तो असंगठि‍त उपभोक्ता होने के कारण भले ही बेवजह के झगडे़ से बचने के लि‍ये चुप होकर बैठ जाये कि‍न्‍तु इंडि‍यन आइल और भारत पैट्रोलि‍यम के सेल्‍स और पीआरओ विभागों को खामोश होकर नहीं बैठना चाहि‍ए। लगातर सर्वेक्षण करवाने पर मि‍ले पब्‍लि‍क फीडबैक के आधार पर उन आपराधि‍क तत्‍वों के प्रति‍ सख्‍ती करनी चाहि‍ए जो आम उपभोक्‍ता को समय से गैस सि‍लेण्डर पहुंचाये जाने की जिम्मेदारी से बचने के लिए साफ्टवेयर में बेखौफ टैम्‍परिंग कर रहे हैं। 
इस मामले में पुलि‍स की साइबर सैल खास उपयोगी साबि‍त हो सकती है, संसाधनों की दृष्‍टि‍ से तकनीकी रूप से गडबडी़ करने वालों तक पहुंचने में पूरी तरह सक्षम है। वर्तमान में आगरा में आम उपभोक्‍ता पूरी तरह से असंगठि‍त है और उसके सामने वि‍तरण तंत्र का एक ऐसा चक्रव्‍यूह है जि‍समें घुसकर नि‍कलना द्वापर युग से भी कई गुना मुश्‍कि‍ल है।
• राजीव सक्सेना
आगरा/फ़ेसबुक

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